प्वॉयंट 5140 की जंग जीतने के बाद कैप्टेन बत्रा
साल 1999 की होली की छुट्टियों में विक्रम आख़िरी बार पालमपुर आए थे. तब उनके माता पिता उन्हें छोड़ने बस अड्डे गए थे. उन्हें ये पता नहीं था कि
वो अपने बेटे को आख़िरी बार देख रहे थे.
गिरधारी लाल बत्रा को वो दिन अभी तक याद हैं, "ज़्यादातर समय उन्होंने अपने दोस्तों के साथ ही बिताया. बल्कि हम लोग थोड़े परेशान भी हो गए थे. हर समय घर में उनके दोस्तों का जमघट लगा रहता था. उनकी माँ ने उनके लिए उनके पसंदीदा व्यंजन राजमा चावल, गोभी के पकौड़े और घर के बने 'चिप्स' बनाए."
"उन्होंने उनके साथ घर का बनाया आम का अचार भी लिया. हम सब उसे बस स्टैंड पर छोड़ने गए. जैसे ही बस चली उसने खिड़की से अपना हाथ हिलाया. मेरी आँखें नम हो गई. मुझे क्या पता था कि हम अपने प्यारे विक्रम को आख़िरी बार देख रहे थे और वो अब कभी हमारे पास लौट कर आने वाला नहीं था."
कारगिल में उनके कमांडिग ऑफ़िसर कर्नल योगेश जोशी ने उन्हें और लेफ़्टिनेंट संजीव जामवाल को 5140 चौकी फ़तह करने की ज़िम्मेदारी सौंपी थी.
रचना बिष्ट रावत बताती हैं, "13 जैक अलाई जो कि विक्रम बत्रा की यूनिट थी, को ये ज़िम्मेदारी दी गई थी कि वो 5140 पर पाकिस्तान की पोस्ट पर हमला कर उसे फिर से भारत के कब्ज़े में लाए. कर्नल योगेश जोशी के पास दो युवा अफ़सर थे, एक थे लेफ़्टिनेंट जामवाल और दूसरे थे कैप्टेन विक्रम बत्रा."
"उन दोनों को उन्होंने बुलाया और एक पत्थर के पीछे से उन्हें दिखाया कि वहाँ तुम्हें चढ़ाई करनी है. रात को ऑपरेशन शुरू होगा. सुबह तक तुम्हें वहाँ पहुंचना होगा."
"उन्होंने दोनों अफ़सरों से पूछा कि मिशन की सफलता के बाद आपका क्या कोड होगा? दोनों अलग-अलग तरफ़ से चढ़ाई करने वाले थे. लेफ़्टिनेंट जामवाल ने कहा 'सर मेरा कोड होगा 'ओ ये ये ये.' उन्होंने जब विक्रम से पूछा कि तुम्हारा क्या कोड होगा तो उन्होंने कहा 'ये दिल माँगे मोर.'"
रचना बिष्ट रावत आगे बताती हैं, "लड़ाई के बीच में कर्नल जोशी ने एक वॉकी-टॉकी का एक 'इंटरसेप्टेड' संदेश सुना. इस लड़ाई में विक्रम का कोड नेम 'शेरशाह' था."
"पाकिस्तानी सैनिक उनसे कह रहे थे, "शेरशाह तुम वापस चले जाओ, नहीं तो तुम्हारी लाश वापस जाएंगी." मैंने सुना कि विक्रम की आवाज़ थोड़ी तीखी हो गई थी. उन्होंने कहा था, "एक घंटे रुक जाओ. फिर पता चलेगा कि किनकी लाशें वापस जाती हैं."
विक्रम की सफलता पर उस समय के सेना प्रमुख जनरल वेदप्रकाश मलिक ने उन्हें ख़ुद फ़ोन कर बधाई दी थी. कैप्टेन बत्रा ने जब सेटेलाइट फोन पर अपने पिता को 5140 पर कब्ज़े की सूचना दी तो वो उसे ढ़ंग से नहीं सुन पाए.
उन्हें ख़राब टेलिफ़ोन लाइन पर 'कैप्चर' शब्द सुनाई पड़ा. उन्हें लगा कि कैप्टेन बत्रा को पाकिस्तानियों ने 'कैप्चर' कर लिया है. बाद में विक्रम ने उनकी ग़लतफ़हमी दूर की. अब विक्रम बत्रा को अगला लक्ष्य दिया गया 4875 को जीतने का.
उस समय उनकी तबियत ख़राब थी. उनके सीने में दर्द था और आँख सुर्ख़ लाल हो चुकी थी. कर्नल योगेश जोशी उन्हें ऊपर भेजने में झिझक रहे थे लेकिन बत्रा ने ही खुद ज़ोर दे कर कहा कि वो इस काम को पूरा करेंगे.
"साढ़े तीन बजे उन्हें लेफ़्टिनेंट जामवाल से वो संदेश सुनाई दिया, 'ओ ये ये ये', जिससे पता चला कि जामवाल वहाँ पहुंच गए थे. थोड़ी देर बाद 4 बज कर 35 मिनट पर विक्रम का भी सफलता का कोड आ गया, 'ये दिल मांगे मोर.'"
रचना बिष्ट रावत बताती हैं, "4875 मुश्को वैली के पास है. पहला ऑपरेशन द्रास में हुआ था. ये लोग पत्थरों का कवर ले कर दुश्मन पर फ़ायर कर रहे थे. तभी उनके एक साथी को गोली लगी और वो उनके सामने ही गिर गया. वो सिपाही खुले में पड़ा हुआ था. विक्रम और रघुनाथ चट्टानों के पीछे बैठे थे."
"विक्रम ने रघुनाथ से कहा कि हम अपने घायल साथी को सुरक्षित स्थान पर लाएंगे. रघुनाथ ने उनसे कहा कि मुझे नहीं लगता कि वो ज़िंदा बच पाएंगे. अगर आप बाहर निकलेंगे तो आपके ऊपर फ़ायर आएगा."
"ये सुनते ही विक्रम बहुत नाराज़ हो गए और बोले, "क्या आप डरते हैं?" रघुनाथ ने जवाब दिया, "नहीं साहब मैं डरता नहीं हूँ. मैं तो सिर्फ़ आपको आगाह कर रहा हूँ. आप आज्ञा देंगे तो हम बाहर जाएंगे." विक्रम ने कहा, "हम अपने सिपाही को इस तरह अकेले नहीं छोड़ सकते."
विक्रम की मौत का सबसे ज़्यादा दुख उनके साथियों और कमांडिंग ऑफ़िसर कर्नल जोशी को था. मेजर जनरल मोहिंदर पुरी को भी ये सुन कर गहरा सदमा लगा था.
जनरल पुरी याद करते हैं, "विक्रम बहुत ही डैशिंग यंग ऑफ़िसर था. हम लोगों के लिए ये बहुत दुख की बात होती है कि आप सुबह यूनिट में जाएं और शाम को वो यूनिट अटैक में जा रही है. सुबह आप सबके साथ हाथ मिलाते हैं और रात को आपके पास संदेश आता है कि वो शख़्स लड़ाई में शहीद हो गया."
"जैसे ही रघुनाथ चट्टान के बाहर कदम रखने वाले थे, विक्रम ने उन्हें कॉलर से पकड़ कर कहा, "साहब आपके तो परिवार और बच्चे हैं. मेरी अभी शादी नहीं हुई है. सिर की तरफ़ से मैं उठाउंगा. आप पैर की तरफ़ से पकड़िएगा." ये कह कर विक्रम आगे चले गए और जैसे ही वो उनको उठा रहे थे, उनको गोली लगी और वो वहीं गिर गए."
गिरधारी लाल बत्रा को वो दिन अभी तक याद हैं, "ज़्यादातर समय उन्होंने अपने दोस्तों के साथ ही बिताया. बल्कि हम लोग थोड़े परेशान भी हो गए थे. हर समय घर में उनके दोस्तों का जमघट लगा रहता था. उनकी माँ ने उनके लिए उनके पसंदीदा व्यंजन राजमा चावल, गोभी के पकौड़े और घर के बने 'चिप्स' बनाए."
"उन्होंने उनके साथ घर का बनाया आम का अचार भी लिया. हम सब उसे बस स्टैंड पर छोड़ने गए. जैसे ही बस चली उसने खिड़की से अपना हाथ हिलाया. मेरी आँखें नम हो गई. मुझे क्या पता था कि हम अपने प्यारे विक्रम को आख़िरी बार देख रहे थे और वो अब कभी हमारे पास लौट कर आने वाला नहीं था."
कारगिल में उनके कमांडिग ऑफ़िसर कर्नल योगेश जोशी ने उन्हें और लेफ़्टिनेंट संजीव जामवाल को 5140 चौकी फ़तह करने की ज़िम्मेदारी सौंपी थी.
रचना बिष्ट रावत बताती हैं, "13 जैक अलाई जो कि विक्रम बत्रा की यूनिट थी, को ये ज़िम्मेदारी दी गई थी कि वो 5140 पर पाकिस्तान की पोस्ट पर हमला कर उसे फिर से भारत के कब्ज़े में लाए. कर्नल योगेश जोशी के पास दो युवा अफ़सर थे, एक थे लेफ़्टिनेंट जामवाल और दूसरे थे कैप्टेन विक्रम बत्रा."
"उन दोनों को उन्होंने बुलाया और एक पत्थर के पीछे से उन्हें दिखाया कि वहाँ तुम्हें चढ़ाई करनी है. रात को ऑपरेशन शुरू होगा. सुबह तक तुम्हें वहाँ पहुंचना होगा."
"उन्होंने दोनों अफ़सरों से पूछा कि मिशन की सफलता के बाद आपका क्या कोड होगा? दोनों अलग-अलग तरफ़ से चढ़ाई करने वाले थे. लेफ़्टिनेंट जामवाल ने कहा 'सर मेरा कोड होगा 'ओ ये ये ये.' उन्होंने जब विक्रम से पूछा कि तुम्हारा क्या कोड होगा तो उन्होंने कहा 'ये दिल माँगे मोर.'"
रचना बिष्ट रावत आगे बताती हैं, "लड़ाई के बीच में कर्नल जोशी ने एक वॉकी-टॉकी का एक 'इंटरसेप्टेड' संदेश सुना. इस लड़ाई में विक्रम का कोड नेम 'शेरशाह' था."
"पाकिस्तानी सैनिक उनसे कह रहे थे, "शेरशाह तुम वापस चले जाओ, नहीं तो तुम्हारी लाश वापस जाएंगी." मैंने सुना कि विक्रम की आवाज़ थोड़ी तीखी हो गई थी. उन्होंने कहा था, "एक घंटे रुक जाओ. फिर पता चलेगा कि किनकी लाशें वापस जाती हैं."
विक्रम की सफलता पर उस समय के सेना प्रमुख जनरल वेदप्रकाश मलिक ने उन्हें ख़ुद फ़ोन कर बधाई दी थी. कैप्टेन बत्रा ने जब सेटेलाइट फोन पर अपने पिता को 5140 पर कब्ज़े की सूचना दी तो वो उसे ढ़ंग से नहीं सुन पाए.
उन्हें ख़राब टेलिफ़ोन लाइन पर 'कैप्चर' शब्द सुनाई पड़ा. उन्हें लगा कि कैप्टेन बत्रा को पाकिस्तानियों ने 'कैप्चर' कर लिया है. बाद में विक्रम ने उनकी ग़लतफ़हमी दूर की. अब विक्रम बत्रा को अगला लक्ष्य दिया गया 4875 को जीतने का.
उस समय उनकी तबियत ख़राब थी. उनके सीने में दर्द था और आँख सुर्ख़ लाल हो चुकी थी. कर्नल योगेश जोशी उन्हें ऊपर भेजने में झिझक रहे थे लेकिन बत्रा ने ही खुद ज़ोर दे कर कहा कि वो इस काम को पूरा करेंगे.
"साढ़े तीन बजे उन्हें लेफ़्टिनेंट जामवाल से वो संदेश सुनाई दिया, 'ओ ये ये ये', जिससे पता चला कि जामवाल वहाँ पहुंच गए थे. थोड़ी देर बाद 4 बज कर 35 मिनट पर विक्रम का भी सफलता का कोड आ गया, 'ये दिल मांगे मोर.'"
रचना बिष्ट रावत बताती हैं, "4875 मुश्को वैली के पास है. पहला ऑपरेशन द्रास में हुआ था. ये लोग पत्थरों का कवर ले कर दुश्मन पर फ़ायर कर रहे थे. तभी उनके एक साथी को गोली लगी और वो उनके सामने ही गिर गया. वो सिपाही खुले में पड़ा हुआ था. विक्रम और रघुनाथ चट्टानों के पीछे बैठे थे."
"विक्रम ने रघुनाथ से कहा कि हम अपने घायल साथी को सुरक्षित स्थान पर लाएंगे. रघुनाथ ने उनसे कहा कि मुझे नहीं लगता कि वो ज़िंदा बच पाएंगे. अगर आप बाहर निकलेंगे तो आपके ऊपर फ़ायर आएगा."
"ये सुनते ही विक्रम बहुत नाराज़ हो गए और बोले, "क्या आप डरते हैं?" रघुनाथ ने जवाब दिया, "नहीं साहब मैं डरता नहीं हूँ. मैं तो सिर्फ़ आपको आगाह कर रहा हूँ. आप आज्ञा देंगे तो हम बाहर जाएंगे." विक्रम ने कहा, "हम अपने सिपाही को इस तरह अकेले नहीं छोड़ सकते."
विक्रम की मौत का सबसे ज़्यादा दुख उनके साथियों और कमांडिंग ऑफ़िसर कर्नल जोशी को था. मेजर जनरल मोहिंदर पुरी को भी ये सुन कर गहरा सदमा लगा था.
जनरल पुरी याद करते हैं, "विक्रम बहुत ही डैशिंग यंग ऑफ़िसर था. हम लोगों के लिए ये बहुत दुख की बात होती है कि आप सुबह यूनिट में जाएं और शाम को वो यूनिट अटैक में जा रही है. सुबह आप सबके साथ हाथ मिलाते हैं और रात को आपके पास संदेश आता है कि वो शख़्स लड़ाई में शहीद हो गया."
"जैसे ही रघुनाथ चट्टान के बाहर कदम रखने वाले थे, विक्रम ने उन्हें कॉलर से पकड़ कर कहा, "साहब आपके तो परिवार और बच्चे हैं. मेरी अभी शादी नहीं हुई है. सिर की तरफ़ से मैं उठाउंगा. आप पैर की तरफ़ से पकड़िएगा." ये कह कर विक्रम आगे चले गए और जैसे ही वो उनको उठा रहे थे, उनको गोली लगी और वो वहीं गिर गए."
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