आख़िर भारत से सारे पड़ोसी बारी-बारी दूर क्यों हो रहे हैं

6 मई 2014 को नरेंद्र मोदी ने जब प्रधानमंत्री पद की शपथ ली तो उन्होंने एक संदेश देने की कोशिश की थी कि वो विदेशी नीति की राह अपने पूर्ववर्ती मनमोहन सिंह से अलग ले जाएंगे.
इसी कड़ी में उन्होंने 'द साउथ एशियन असोसिएशन फ़ॉर रीजनल कोऑपरेशन' (सार्क) देशों के सभी प्रधानमंत्रियों को शपथ ग्रहाण समारोह में बुलाया था. कई राजनयिकों का मानना था कि मोदी ने विदेश नीति में भारत के हितों को केंद्र में रखा.
भारतीय जनता पार्टी अक्सर नेहरूवादी नीतियों की आलोचना करती रही है कि इसमें भारत के हितों की उपेक्षा की जाती रही है. दूसरे विश्व युद्ध के बाद रूस और अमरीका के नेतृत्व में दो ध्रुवों में बँटी दुनिया में नेहरू ने भारत के लिए गुटनिरपेक्ष की राह को अपनाया था. गुटनिरपेक्ष नीति की आलोचना की जाती है कि भारत को इससे कुछ फ़ायदा नहीं हुआ.
पीएम मोदी ने अमरीका के साथ संबंधों को और गहरा करने की कोशिश की तो दूसरी तरफ़ भारत के पारंपरिक दोस्त रूस से भी क़रीबी बनाए रखने के प्रयास किए.
हिन्द महासागर में चीन के बढ़ते प्रभाव को लेकर भारत की वर्तमान सरकार ने अमरीका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ मिलकर चतुष्कोणीय सुरक्षा संवाद को आगे बढ़ाया.
मोदी ने विदेशी दौरे भी ख़ूब किए और ऐसी कोशिश दिखी कि बदलती वैश्विक व्यवस्था में भारत की जगह बनी रहे.
भारत इसी दौरान फ़्रांस को पीछे छोड़ दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया. केंद्र की वर्तमान सरकार ने सीमा पार म्यांमार और पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में सैन्य कार्रवाई का दावा किया.
मोदी सरकार ने ऐसा दिखाने की कोशिश की कि वो आतंकवाद और चरमपंथी को लेकर दबकर नहीं रहेगी. पड़ोसी देश भूटान में भी डोकलाम सीमा पर चीन ने निर्माण कार्य शुरू किया तो भारत ने अपनी फ़ौज भेज दी.
लेकिन क्या विदेश नीति के मोर्चे पर सब कुछ ठीक-ठाक है? अगर पड़ोसी देशों और दक्षिण एशिया में भारत की विदेश नीति का आकलन करें तो कई झटके लगे हैं. बाकी सरकारों की तरह पाकिस्तान से इस सरकार में भी संबंध अच्छे नहीं हुए हैं.
पूर्व राजनयिक और जेडीयू नेता पवन वर्मा कहते हैं, ''पाकिस्तान के साथ संबंध ख़राब सभी सरकारों के ज़रूर रहे हैं, लेकिन ये सरकार कुछ कन्फ़्यूज़ है. पाकिस्तान से बात होगी कि नहीं होगी, इस पर कोई स्पष्टता नहीं है. जम्मू-कश्मीर में इनकी गठबंधन वाली सरकार थी, लेकिन ठीक से चलने नहीं दिया. एक तरफ़ सख़्ती दिखाते हैं तो दूसरी तरफ़ पठानकोट में पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई को बुला लेते हैं. दोनों देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार भी मिलते हैं तो विदेश में मिलते हैं. सर्जिकल स्ट्राइक किया गया तो उसका ऐसे प्रचार-प्रसार किया गया मानो पाकिस्तान को कितना नुक़सान कर दिया गया है.''
भारतीय विदेश नीति के विशेषज्ञ ब्रह्म चेलानी ने द डिप्लोमैट को दिए एक इंटरव्यू में कहा है, ''डोकलाम पर हो सकता है कि भारत के मन में सामरिक संतोष जैसा भाव हो, लेकिन चीन ने चालाकी से इसमें रणनीतिक स्तर पर जीत हासिल की है. चीन विवादित इलाक़े में निर्माण कार्य कर रहा है. इन सबके बीच अब भूटान अपनी सुरक्षा को लेकर भारत पर भरोसा करने से पहले दो बार सोचेगा. दक्षिण एशिया और इसके क़रीब के देशों से भारत दूर हुआ है. नेपाल, श्रीलंका, मालदीव, अफ़ग़ानिस्तान और ईरान में भारत की स्थिति कमज़ोर हुई है. ऐसा भारत की दूरदर्शिता में अभाव के कारण हुआ है. शुरू में मोदी ने मज़बूत शुरुआत की थी, लेकिन आगे चलकर चीज़ें नाकाम रहीं.''
कई आलोचकों का कहना है कि भारत की विदेश नीति में भूराजनैतिक दूरदर्शिता के अभाव के कारण ही उसका प्रभाव अपने भी इलाक़े में उस तरह से नहीं है.
वरिष्ठ पत्रकार भारत भूषण कहते हैं, ''बीजेपी कांग्रेस की जिन नीतियों की आलोचना करती थी उस पर ख़ुद बुरी तरह से नाकाम होती दिख रही है. मोदी सरकार अमरीका के लिए सब कुछ दांव पर लगा रही है, लेकिन अमरीका ईरान से तेल आयात नहीं करने दे रहा. रूस से हथियार नहीं ख़रीदने दे रहा. जिस रूस ने भारत को रक्षा मामलों में वो तकनीक दिया जिसे वो ख़ुद इस्तेमाल करता है, लेकिन इस रिश्ते को लेकर एक किस्म की बेफ़िक्री दिख रही है.''
भारत भूषण कहते हैं, ''न आप एनएसजी के मेंबर बन पाए, न पाकिस्तान से किसी आतंकी को ला पाए. मालदीव में चीन पूरी तरह से जम चुका है. आप अपने हेलिकॉप्टर तक नहीं रख पा रहे हैं. बांग्लादेश में विपक्षी पार्टी से आपका कोई संबंध नहीं है. डोकलाम में जो हुआ उससे भूटान का भी मिज़ाज आपको लेकर ख़राब हुआ. वो आप पर भरोसा करने से पहले कई बार सोचेगा. लोग उम्मीद कर रहे थे कि भारत विदेश नीति के मामले में सूझबूझ दिखाएगा, लेकिन यहां तो कोई दूरदर्शिता ही नहीं है.''
कई आलोचक तो मानते हैं कि ईरान दशकों से प्रतिबंध झेल रहा है, लेकिन उसका एक अपना प्रभाव है. ईरान की तुलना में भारत बहुत बड़ा देश है पर उसका अपने भी इलाक़े में प्रभाव नहीं है.
मालदीव में अब्दुल्ला यामीन की सरकार आने के बाद से भारत की स्थिति वहां काफ़ी कमज़ोर हुई है.
मालदीव को भारत ने दो हेलिकॉप्टर दिया था जिसे वो वापस ले जाने को कह रहा है. इसी साल फ़रवरी में राष्ट्रपति यामीन ने मालदीव में आपातकाल लगा विपक्षी नेताओं और जजों को गिरफ़्तार कर लिया था. भारत ने आपातकाल का विरोध किया था और तब से मालदीव चीन और पाकिस्तान के क़रीब गया है.
भारत मालदीव में बदले हालत को राजनयिक दबाव के ज़रिए सुधारने में नाकाम रहा. यहां तक कि भारतीय कंपनी जीएमआर से मालदीव ने 511 अरब डॉलर की लागत से विकसित होने वाले अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे की डील को रद्द कर दिया.
मसला केवल मालदीव का नहीं है. चीन का प्रभाव श्रीलंका और नेपाल में भी बढ़ रहा है. 2015 में श्रीलंका में चुनाव हुए तो मैत्रीपाला सिरीसेना राष्ट्रपति बने. श्रीलंका के पूर्व राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे की तुलना में मैत्रीपाला को भारत का क़रीबी माना जाता था.

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